शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

समाज का सिनेमा the reall story of indian social

honeywithpoem.blogspot.com
समाज शब्द  सुनने मै जितना सुन्दर है यथ्रात के धरातल  पर  उतना ही  भयानक    मेरे एक अद्यापक कहा करते थे की समाज चन्द गुंडे लोगो का समहू है जो लोगो को छलता   रहता  है   अगर आजाद होना है तो  हमें समाज से आजाद होना चहिये समाज नाम का ये  भयानक किरदार इंसान की जिन्दगी का सब से बड़ा खलनायक है  ये प्रेम चोपरा की तरह  पुरे के पुरे व्यक्ति की डकार मार कर अमरीश पूरी की तरह खुश होता  है
समाज तो शक्ति कपूर जेसा है  कोई भी लड़की नज़र आई तो उसे गुरना शरू (आहू ..आहू.)  ( नज़र रखना शरू)   
समाज तो ३ इन वन खलनायक है और तो आश्चर्ये की बात है की जिन्दगी के सिनेमा मै खलनायक के खिलाफ कोई नायक खड़ा ही  नहीं हो पाता ( ये पहला  सिनेमा है जाह पर  नायक की हार होती है )  खड़े होने से पहले ही  समाज के लम्बे लम्बे ताने नायक को जिन्दा ही  दफ़न कर देते है   जिन्दगी के सिनेमा मै कही प्रेम  कहानीया बनती है  रोज कई लैला मजनू  मरते है कही आशिक  कतल होते है  तो किसी  का प्यार  सांस  भी नहीं ले पाता  है
 पर यहाँ  समाज का राज है  यहाँ  वही चलेगा जो समाज चाएगा इस फिल्म (सिनेमा) मै एक ही डायलोग है अरे समाज क्या कहेगा  कुछ तो समाज की सोच  इधर न सन्नी  पाजी का ढाई किलो का हाथ काम आता  है  न कुछ  समाज  तो पुरानी हिंदी  (फिल्मो ) सिनेमा का  ठाकुर  होता है जो केवल गरीबो का खून चूसा करता था और समाज रूपी  ठाकुर केवल माद्यम वर्ग को छलता है समाज  का जहर तो होता हे माद्यम वर्ग के लिए है  ग़रीब अगर समाज के खिलाफ कुछ करे तो   कहा  जाता है  गरीब है  ऐसी हरकत तो करंगे हे वरना बेचारे जायेंगे कहा और अमीर करे तो नयी फैशन मरता तो मिद्दल क्लास है   सम्माज के फूटे ढोल को मिद्दल  क्लास इंसान दोनों और से जोरो से बजा बजा कर अपनी जुटी ख़ुशी का दिखावा कर रहा है         समाज  तो एक लुटेरा है   

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

फिर आया ये वसंत

फिर आया  ये वसंत सूखे पतों के साथ

कभी यहाँ गिरते 

    कभी वहा गिरते 

उसकी जुल्फों से लहराते पते      

   कभी सर्सरहात  का अहश्हाश देते वसंत के  पते 

जेसे वो दोड़कर सीने से लगता था  जम कर बाहों मै लेता था
             
आज सीने से टकराते पते 

महबूब  की खुसबू  देती वसंत की हवा

उसके पास आने का    अहश्हाश दिलाती हवा

फिर आया वसंत ले कर उसकी यादे  




मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

अश्क

आज शाम डलते डलते कोई ४ बजे होगे और आज  आसमान की आँखों मै भी नशा  नजर आ रहा है
   जेसे पूरी रात सोया न हो आँखे भारी सी है 
कुछ अश्क की बुँदे  इशक के धरातल पर टपकने को आतुर सी नज़र आती है 
आकाश की छवि धरातल के अक्ष से आज बड़ी धुंधली सी नज़र आ रही है
 जेसे कोई पुरानी तस्वीर याद आ रही हो उसके साथ गुजरा ज़माना याद आ रहा हो  आँखों  के 
सामने सब दुन्ध्ला सा है लगता है  आसमा के आशु   निकल आयेंगे इतनी बड़ी गहरी आखो मै 
कब तक तेर पायेंगे  दूर पाहडी  पर तहरा आकश एसा नज़र आता है जेसे अभी रो देगा 
न जाने क्यों आज आकश इतना प्यारा और दर्द का सागर लगता है दिल मै तड़प उठती है की इसे बाहों मै 
ले कर जी भर कर रो ले आसमा के  के साथ अपने अश्क  खो दे    

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

आज फिर वसंत लौट आया है


 आज फिर वसंत लौट आया है तेज हवा चुभती धुप के साथ
पेड़ो से पते पक कर गिरने लगे है आम पीपल नीम पलाश गुलमोहर  
से गिरते पतों को देखकर कहता हु की काश...........................
   जो दुखो का सैलाब मुजशे जुड़ा है वो भी अब तो पक चूका है.
काश ये दर्द का सैलाब भी इन सूखे पतों की तरह  मेरे जिस्म ऐ (रूह)
का साथ छोड़ दे.                       ........................................................................................................................................................     सुहानी लगती है वसंत की चांदनी  राते हलके
होकर चमकते पेड़ सुख के सागर मै गोत्ते लगाते ये पेड़ बड़े सुन्धर मालूम होते है
चमकते पेड़ इन चांदनी रातो मै जानत का नज़ारा देते है  जेसे श्री कृष्ण ने यही राश रचा हो 
 चांदनी रात मै बांशुरी बजाई हो  हो समधुर सुर है सारा का सारा वातावरण जेसे ख़ुशी  के
 फाग मै रंगा हो  सबने अपने दुखो को त्याग कर जिस्म ऐ रूह को हल्का कर लिया  काश वसंत की चांदनी रात मै गिरते पतों की तरहे मेरा भी दर्द सदा  सदा की लिए कृष्ण की सुमधुर बांशुरी  मै खो जाये  गिरते पतों मै ये दर्द भी गिर जाए 


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

love latter

i love you  you are god for me avey breath i rember u again and again  plz naver let go
मेरी  sajni ......                                                                                                                                            इस बसंत मै न जाने क्यों बार बार दिल से एक अव्वाज उठती है की हर लम्हा तेरे   आगोश मै गुजार दू                  एक चांदनी रात  तेरे साथ बाते करते गुजार दू                                                                                                 हर लम्हा तेरे सजदे मै गुज्जरने की चाहत रकता  हु        तेरी खुबसूरत बेलोरी सिषे  से  आँखों मै  खुद का उजल्ला सा चेअर दखने की चाहत  बेहताशा बढती जा रही है हर रात चाँद को देखकर कुछ  गुनगुनाता रहता हु      पर अचानक से रुक जाता  हु  जब तुम मुजशे नाराज होती हो तो लगता है    ये रात मुझे काटने को आयेगी  चाँद से भी नफ़रत होती है ये    तो तेरी मोहबत  है जोचाँद  को देखने पर मजबूर  कर देती है   , जान  तुमारे साथ इतने रिश्तो को आयाम दे चूका हु  की उनके टूटने के दर से हे सिहर जाता हु  कल रात सपने मै तुमै नाराज होते देखा था और तुम मुझे छोड़ कर किसी महल की और चली जा रही हो   मेरी हर अव्वाज को नकारते   हुए   इस  एक पल के सपने  ने आँखों की सारी नीद उदा  daali  आज जान तुम मुजशे नाराज भी हो न जाने क्यों डर  है  कई तुम मुझे    अकेला छोड़ कर न चली जाओ तुमै खोने का डर मौत के डर से भी जायदा हो गया है लिखते लिखते मेरे हाथ भी कापने लगे है  ये लिखे हुए सबध तुम पढ़ पाओगे या नहीं वेसे भी तो तुमे मेरी (हस्त लेकन .)   बड़ी बेकार लगती है और तुमारा फरमान था की रोज कुछ पेज  नक़ल रोज किया करू  उसे करता  भी हु  पर कभी कभी                                                                                                                                                    तुमे ये बाते मेरे दिल की आवारगी  लगे  पर ये हकीकत का तराना  है